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भारत में चीतों की संख्या बढ़कर 56 हुई, 1952 में घोषित हुए थे विलुप्त, वन्यजीवन के लिए क्यों हैं जरूरी?

 Written By: Rituraj Tripathi
 Published : Sep 21, 2026 07:59 am IST,  Updated : Sep 21, 2026 07:59 am IST

भारत में कभी विलुप्त घोषित हो चुके चीतों की संख्या अब बढ़कर 56 हो गई है। अच्छी बात ये है कि इनमें से 36 का जन्म भारत की धरती पर हुआ है। इसे भारत के वाइल्ड लाइफ संरक्षण के प्रयासों के लिए बड़ी सफलता माना जा रहा है।

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भारत में चीतों की संख्या बढ़ी Image Source : INDIA TV

Highlights

  • भारत में "प्रोजेक्ट चीता" हुआ सफल
  • चीतों की संख्या बढ़कर 56 हुई
  • 36 चीतों का जन्म भारत की धरती पर हुआ

नई दिल्ली: प्रकृति से एक बार जो चीज विलुप्त हो जाए, उसे वापस प्रकृति में लाना बहुत मुश्किल या फिर नामुमकिन सा हो जाता है। अगर बात वन्यजीवों की हो तो ये बात सच भी मालूम होती है क्योंकि ऐसे तमाम उदाहरण वन्यजीवों के इतिहास में भरे पड़े हैं। सबसे बड़ा उदाहरण तो डायनासोर है, जिसकी चर्चा तो होती है लेकिन वो दुनिया में मौजूद नहीं हैं।

इन सारी बातों को ध्यान में रखने के बाद भी भारत की धरती को इतिहास बन चुकी चीजों को दोबारा जागृत करने के लिए जाना जाता है। इसका ताजा उदाहरण है "प्रोजेक्ट चीता"। 

देश में एक बार फिर अठखेलियां कर रहे चीता

"प्रोजेक्ट चीता" के तहत भारत में एक बार फिर चीतों की दहाड़ गूंज रही है। दरअसल चीतों को 1952 में भारत से विलुप्त घोषित कर दिया गया था लेकिन आज प्रोजेक्ट चीता के तहत भारत में एक बार फिर चीतों को अठखेलियां करते हुए देखा जा रहा है।

यह भारत के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों की एक बड़ी उपलब्धि है। आज भारत में चीतों की संख्या बढ़कर 56 हो गई है, जिनमें 36 का जन्म भारत की धरती पर हुआ है। वाकई भारत के वन्यजीव संरक्षण के लिए ये एक बड़ी खुशखबरी है।

कभी विलुप्त घोषित थे, आज संख्या बढ़ने से खुशी का माहौल

MyGov India ने अपने एक्स हैंडल पर इस बात की जानकारी साझा की है। MyGov India ने एक्स पर पोस्ट कर बताया, "भारत में फिर गूंज रही है चीतों की दहाड़! 1952 में भारत से विलुप्त घोषित होने के बाद चीतों ने प्रोजेक्ट चीता के तहत एक शानदार वापसी की है। यह भारत के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों की एक बड़ी उपलब्धि है। आज भारत में चीतों की संख्या बढ़कर 56 हो गई है, जिनमें 36 का जन्म भारत की धरती पर हुआ है।"

वन्यजीवन के लिए क्यों जरूरी हैं चीता?

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Image Source : INDIA TVवन्यजीवन के लिए बेहद जरूरी है चीता

चीता, वन्यजीवन के लिए बेहद जरूरी जीव हैं। दरअसल ये वाइल्ड लाइफ में एक शिकारी के रूप में जाने जाते हैं और जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बनाए रखते हैं। इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि चीता मुख्य रूप से छोटे-मध्यम आकार के शाकाहारी जानवरों का शिकार करता है, जिसमें मुख्य रूप से हिरण, चिकारे, इम्पाला, गजेल आदि होते हैं। ऐसे में इन शाकाहारी जानवरों की संख्या का संतुलन बना रहता है। अगर चीता नहीं होगा तो इन शाकाहारी जानवरों की संख्या नियंत्रण से बाहर हो जाएगी, जोकि न तो जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अच्छी बात है और न ही मानव जीवन के लिए।

ट्रॉफिक कैस्केड का खतरा

वन्यजीवन में अगर शाकाहारी जानवरों की संख्या बढ़ेगी तो वह घास-वनस्पति को ज्यादा चरेंगे, ऐसा होने पर मिट्टी का कटाव तो बढ़ेगा ही, साथ में पौधों की विविधता भी घट जाएगी। ऐसे में वन्यजीवन का पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर पड़ जाएगा, जिसका असर इंसानों की दुनिया पर भी देखने को मिलेगा।

जंगल में इस प्रभाव को ट्रॉफिक कैस्केड (Trophic Cascade) कहा जाता है। इसके तहत अगर कोई प्रजाति जंगल से गायब होती है तो जंगल यानी वन्यजीवन की पूरी खाद्य श्रृंखला पर असर पड़ता है, जिसकी परेशानी अन्य जीव-जंतुओं को भी उठानी पड़ती है।

और कैसे वन्यजीवन को संतुलित रखता है चीता?

चीते मांसाहारी जीव हैं और उन्हें खाने के लिए किसी भी कीमत पर मांस चाहिए। वह कमजोर या बीमार जानवरों का शिकार करते हैं। अक्सर वह पेट भरने पर अपना खाना छोड़ देते हैं। ऐसे में चीतों द्वारा छोड़े गए खाने के अवशेष को गिद्ध, लकड़बग्घे और सियार जैसे जानवर खाते हैं। इस तरह जंगल की पूरी व्यवस्था चलती रहती है। शिकार एक जीव करता है लेकिन पेट कई जीवों का भरता है। वहीं दूसरी तरफ शाकाहारी जानवरों की संख्या भी असीमित नहीं होती और जंगल अपने आप ही सुचारू रूप से चलता रहता है।

बता दें कि इससे पहले एक चीते द्वारा शिकार का वीडियो खूब चर्चा में आया था। दरअसल राजस्थान में कूनो नेशनल पार्क का चीता घुस गया था और उसने बकरी का शिकार किया था।

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